श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.30

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

येनाहमात्मायतनं विनिर्मिता

धात्रा यतोऽयं गुणसर्गसङ्ग्रहः।

स एव मां हन्तुमुदायुधः स्वरा-

डुपस्थितोऽन्यं शरणं कमाश्रये॥ ३०

yenāhamātmāyatanaṃ vinirmitā

dhātrā yato'yaṃ guṇasargasaṅgrahaḥ|

sa eva māṃ hantumudāyudhaḥ svarā-

ḍupasthito'nyaṃ śaraṇaṃ kamāśraye|| 30

अर्थ

आप सम्पूर्ण जगत‍्के विधाता हैं; आपने ही यह त्रिगुणात्मक सृष्टि रची है और मुझे समस्त जीवोंका आश्रय बनाया है। आप सर्वथा स्वतन्त्र हैं। प्रभो! जब आप ही अस्त्र-शस्त्र लेकर मुझे मारनेको तैयार हो गये, तब मैं और किसकी शरणमें जाऊँ?॥ ३०॥

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