कल्पके आरम्भमें आपने अपने आश्रित रहनेवाली अनिर्वचनीया मायासे ही इस चराचर जगत्की रचना की थी और उस मायाके ही द्वारा आप इसका पालन करनेके लिये तैयार हुए हैं। आप धर्मपरायण हैं; फिर भी मुझ गोरूपधारिणीको किस प्रकार मारना चाहते हैं?॥ ३१॥
य एतदादावसृजच्चराचरं
स्वमाययाऽऽत्माश्रययावितर्क्यया।
तयैव सोऽयं किल गोप्तुमुद्यतः
कथं नु मां धर्मपरो जिघांसति॥ ३१
कल्पके आरम्भमें आपने अपने आश्रित रहनेवाली अनिर्वचनीया मायासे ही इस चराचर जगत्की रचना की थी और उस मायाके ही द्वारा आप इसका पालन करनेके लिये तैयार हुए हैं। आप धर्मपरायण हैं; फिर भी मुझ गोरूपधारिणीको किस प्रकार मारना चाहते हैं?॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.17.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 492) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/17/31/