॥ श्रीहरिः ॥
कृत्वा वत्सं सुरगणा इन्द्रं सोममदूदुहन्।
हिरण्मयेन पात्रेण वीर्यमोजो बलं पयः॥ १५
kṛtvā vatsaṃ suragaṇā indraṃ somamadūduhan|
hiraṇmayena pātreṇa vīryamojo balaṃ payaḥ|| 15
अर्थ
देवताओंने इन्द्रको बछड़ेके रूपमें कल्पना कर सुवर्णमय पात्रमें अमृत, वीर्य (मनोबल), ओज (इन्द्रियबल) और शारीरिक बलरूप दूध दुहा॥ १५॥✎ 400
कृत्वा वत्सं सुरगणा इन्द्रं सोममदूदुहन्।
हिरण्मयेन पात्रेण वीर्यमोजो बलं पयः॥ १५
देवताओंने इन्द्रको बछड़ेके रूपमें कल्पना कर सुवर्णमय पात्रमें अमृत, वीर्य (मनोबल), ओज (इन्द्रियबल) और शारीरिक बलरूप दूध दुहा॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.18.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 494) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/18/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #400 शब्दोंके बीचका स्थान: पात्रमेंमदिरा → पात्रमें मदिरा