॥ श्रीहरिः ॥
दैतेया दानवा वत्सं प्रह्रादमसुरर्षभम्।
विधायादूदुहन् क्षीरमयःपात्रे सुरासवम्॥ १६
daiteyā dānavā vatsaṃ prahrādamasurarṣabham|
vidhāyādūduhan kṣīramayaḥpātre surāsavam|| 16
अर्थ
दैत्य और दानवोंने असुरश्रेष्ठ प्रह्लादजीको वत्स बनाकर लोहेके पात्रमें मदिरा और आसव (ताड़ी आदि) रूप दूध दुहा॥ १६॥✎ 400
दैतेया दानवा वत्सं प्रह्रादमसुरर्षभम्।
विधायादूदुहन् क्षीरमयःपात्रे सुरासवम्॥ १६
दैत्य और दानवोंने असुरश्रेष्ठ प्रह्लादजीको वत्स बनाकर लोहेके पात्रमें मदिरा और आसव (ताड़ी आदि) रूप दूध दुहा॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.18.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 494) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/18/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #400 शब्दोंके बीचका स्थान: पात्रमेंमदिरा → पात्रमें मदिरा