श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.18.16

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

दैतेया दानवा वत्सं प्रह्रादमसुरर्षभम्।

विधायादूदुहन् क्षीरमयःपात्रे सुरासवम्॥ १६

daiteyā dānavā vatsaṃ prahrādamasurarṣabham|

vidhāyādūduhan kṣīramayaḥpātre surāsavam|| 16

अर्थ

दैत्य और दानवोंने असुरश्रेष्ठ प्रह्लादजीको वत्स बनाकर लोहेके पात्रमें मदिरा और आसव (ताड़ी आदि) रूप दूध दुहा॥ १६॥✎ 400

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #400 शब्दोंके बीचका स्थान: पात्रमेंमदिरा → पात्रमें मदिरा

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