श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.18.26

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

सर्वे स्वमुख्यवत्सेन स्वे स्वे पात्रे पृथक् पयः।

सर्वकामदुघां पृथ्वीं दुदुहुः पृथुभाविताम्॥ २६

sarve svamukhyavatsena sve sve pātre pṛthak payaḥ|

sarvakāmadughāṃ pṛthvīṃ duduhuḥ pṛthubhāvitām|| 26

अर्थ

पृथ्वी तो सभी अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली है और इस समय वह पृथुजीके अधीन थी। अतः उससे सभीने अपनी-अपनी जातिके मुखियाको बछड़ा बनाकर अलग-अलग पात्रोंमें भिन्‍न-भिन्‍न प्रकारके पदार्थोंको दूधके रूपमें दुह लिया॥ २६॥

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