महाराज पृथु तो एकमात्र श्रीहरिको ही अपना प्रभु मानते थे। उनकी कृपासे उस यज्ञानुष्ठानमें उनका बड़ा उत्कर्ष हुआ। किन्तु यह बात देवराज इन्द्रको सहन न हुई और उन्होंने उसमें विघ्न डालनेकी भी चेष्टा की॥ १०॥
इति चाधोक्षजेशस्य पृथोस्तु परमोदयम्।
असूयन् भगवानिन्द्रः प्रतिघातमचीकरत्॥ १०
महाराज पृथु तो एकमात्र श्रीहरिको ही अपना प्रभु मानते थे। उनकी कृपासे उस यज्ञानुष्ठानमें उनका बड़ा उत्कर्ष हुआ। किन्तु यह बात देवराज इन्द्रको सहन न हुई और उन्होंने उसमें विघ्न डालनेकी भी चेष्टा की॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 497) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/19/10/