श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.10

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

इति चाधोक्षजेशस्य पृथोस्तु परमोदयम्।

असूयन् भगवानिन्द्रः प्रतिघातमचीकरत्॥ १०

iti cādhokṣajeśasya pṛthostu paramodayam|

asūyan bhagavānindraḥ pratighātamacīkarat|| 10

अर्थ

महाराज पृथु तो एकमात्र श्रीहरिको ही अपना प्रभु मानते थे। उनकी कृपासे उस यज्ञानुष्ठानमें उनका बड़ा उत्कर्ष हुआ। किन्तु यह बात देवराज इन्द्रको सहन न हुई और उन्होंने उसमें विघ्न डालनेकी भी चेष्टा की॥ १०॥

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