॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.19.9
सिन्धवो रत्ननिकरान् गिरयोऽन्नं चतुर्विधम्।
उपायनमुपाजह्रुः सर्वे लोकाः सपालकाः॥ ९
sindhavo ratnanikarān girayo'nnaṃ caturvidham|
upāyanamupājahruḥ sarve lokāḥ sapālakāḥ|| 9
अर्थ
समुद्र बहुत-सी रत्नराशियाँ, पर्वत भक्ष्य, भोज्य, चोष्य और लेह्य—चार प्रकारके अन्न तथा लोकपालोंके सहित सम्पूर्ण लोक तरह-तरहके उपहार उन्हें समर्पण करते थे॥ ९॥✎ 401