नदियाँ दाख और ईख आदि सब प्रकारके रसोंको बहा लाती थीं तथा जिनसे मधु चूता रहता था—ऐसे बड़े-बड़े वृक्ष दूध, दही, अन्न और घृत आदि तरह-तरहकी सामग्रियाँ समर्पण करते थे॥ ८॥✎ 401
ऊहुः सर्वरसान्नद्यः क्षीरदध्यन्नगोरसान्।
तरवो भूरिवर्ष्माणः प्रासूयन्त मधुच्युतः॥ ८
नदियाँ दाख और ईख आदि सब प्रकारके रसोंको बहा लाती थीं तथा जिनसे मधु चूता रहता था—ऐसे बड़े-बड़े वृक्ष दूध, दही, अन्न और घृत आदि तरह-तरहकी सामग्रियाँ समर्पण करते थे॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 496) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/19/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)