श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.15

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

वधान्‍निवृत्तं तं भूयो ह२न्तवेऽत्रिरचोदयत्।

जहि यज्ञहनं तात महेन्द्रं विबुधाधमम्॥ १५

vadhānnivṛttaṃ taṃ bhūyo hantave'triracodayat|

jahi yajñahanaṃ tāta mahendraṃ vibudhādhamam|| 15

अर्थ

जब वह इन्द्रपर वार किये बिना ही लौट आया, तब महर्षि अत्रिने पुनः उसे इन्द्रको मारनेके लिये आज्ञा दी—‘वत्स! इस देवताधम इन्द्रने तुम्हारे यज्ञमें विघ्न डाला है, तुम इसे मार डालो’॥ १५॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—हन्तुमत्रिर०।

    (मुद्रित पृष्ठ 497)

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