वीर विजिताश्व अपना घोड़ा लेकर पिताकी यज्ञशालामें लौट आया। तबसे इन्द्रके उस निन्दित वेषको मन्दबुद्धि पुरुषोंने ग्रहण कर लिया॥ २२॥✎ 402403
वीरश्चाश्वमुपादाय पितृयज्ञमथाव्रजत्।
तदवद्यं हरे रूपं जगृहुर्ज्ञानदुर्बलाः॥ २२
वीर विजिताश्व अपना घोड़ा लेकर पिताकी यज्ञशालामें लौट आया। तबसे इन्द्रके उस निन्दित वेषको मन्दबुद्धि पुरुषोंने ग्रहण कर लिया॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 498) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/19/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)