श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.22

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

वीरश्चाश्‍वमुपादाय पितृयज्ञमथाव्रजत्।

तदवद्यं हरे रूपं जगृहुर्ज्ञानदुर्बलाः॥ २२

vīraścāśvamupādāya pitṛyajñamathāvrajat|

tadavadyaṃ hare rūpaṃ jagṛhurjñānadurbalāḥ|| 22

अर्थ

वीर विजिताश्‍व अपना घोड़ा लेकर पिताकी यज्ञशालामें लौट आया। तबसे इन्द्रके उस निन्दित वेषको मन्दबुद्धि पुरुषोंने ग्रहण कर लिया॥ २२॥✎ 402 403

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #402 शब्दोंके बीचका स्थान: होजाते → हो जाते
  • #403 शब्दोंके बीचका स्थान: उपधर्ममात्रहैं। → उपधर्ममात्र हैं।

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