श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.23

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

यानि रूपाणि जगृहे इन्द्रो हयजिहीर्षया।

तानि पापस्य खण्डानि लिंगं खण्डमिहोच्यते॥ २३

yāni rūpāṇi jagṛhe indro hayajihīrṣayā|

tāni pāpasya khaṇḍāni liṃgaṃ khaṇḍamihocyate|| 23

अर्थ

इन्द्रने अश्‍वहरणकी इच्छासे जो-जो रूप धारण किये थे, वे पापके खण्ड होनेके कारण पाखण्ड कहलाये। यहाँ ‘खण्ड’ शब्द चिह्नका वाचक है॥ २३॥✎ 402 403

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #402 शब्दोंके बीचका स्थान: होजाते → हो जाते
  • #403 शब्दोंके बीचका स्थान: उपधर्ममात्रहैं। → उपधर्ममात्र हैं।

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