॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.19.27
तमृत्विजः शक्रवधाभिसन्धितं
विचक्ष्य दुष्प्रेक्ष्यमसह्यरंहसम्।
निवारयामासुरहो महामते
न युज्यतेऽत्रान्यवधः प्रचोदितात्॥ २७
tamṛtvijaḥ śakravadhābhisandhitaṃ
vicakṣya duṣprekṣyamasahyaraṃhasam|
nivārayāmāsuraho mahāmate
na yujyate'trānyavadhaḥ pracoditāt|| 27
अर्थ
उस समय क्रोधावेशके कारण उनकी ओर देखा नहीं जाता था। जब ऋत्विजोंने देखा कि असह्य पराक्रमी महाराज पृथु इन्द्रका वध करनेको तैयार हैं, तब उन्हें रोकते हुए कहा, ‘राजन्! आप तो बड़े बुद्धिमान् हैं, यज्ञदीक्षा ले लेनेपर शास्त्रविहित यज्ञपशुको छोड़कर और किसीका वध करना उचित नहीं है॥ २७॥