इस यज्ञकार्यमें विघ्न डालनेवाला आपका शत्रु इन्द्र तो आपके सुयशसे ही ईर्ष्यावश निस्तेज हो रहा है। हम अमोघ आवाहन-मन्त्रोंद्वारा उसे यहीं बुला लेते हैं और बलात् अग्निमें हवन किये देते हैं’॥ २८॥
वयं मरुत्वन्तमिहार्थनाशनं
ह्वयामहे त्वच्छ्रवसा हतत्विषम्।
अयातयामोपहवैरनन्तरं
प्रसह्य राजन् जुहवाम तेऽहितम्॥ २८
इस यज्ञकार्यमें विघ्न डालनेवाला आपका शत्रु इन्द्र तो आपके सुयशसे ही ईर्ष्यावश निस्तेज हो रहा है। हम अमोघ आवाहन-मन्त्रोंद्वारा उसे यहीं बुला लेते हैं और बलात् अग्निमें हवन किये देते हैं’॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 499) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/19/28/