आपका मंगल हो! आप और इन्द्र—दोनोंकी पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीहरिके शरीर हैं; इसलिये अपने ही स्वरूपभूत इन्द्रके प्रति आपको क्रोध नहीं करना चाहिये॥ ३३॥✎ 404
नैवात्मने महेन्द्राय रोषमाहर्तुमर्हसि।
उभावपि हि भद्रं ते उत्तमश्लोकविग्रहौ॥ ३३
आपका मंगल हो! आप और इन्द्र—दोनोंकी पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीहरिके शरीर हैं; इसलिये अपने ही स्वरूपभूत इन्द्रके प्रति आपको क्रोध नहीं करना चाहिये॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 499) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/19/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)