आपका यह यज्ञ निर्विघ्न समाप्त नहीं हुआ—इसके लिये आप चिन्ता न करें। हमारी बात आप आदरपूर्वक स्वीकार कीजिये। देखिये, जो मनुष्य विधाताके बिगाड़े हुए कामको बनानेका विचार करता है, उसका मन अत्यन्त क्रोधमें भरकर भयंकर मोहमें फँस जाता है॥ ३४॥✎ 404
मास्मिन्महाराज कृथाः स्म चिन्तां
निशामयास्मद्वच आदृतात्मा।
यद्ध्यायतो दैवहतं नु कर्तुं
मनोऽतिरुष्टं विशते तमोऽन्धम्॥ ३४
आपका यह यज्ञ निर्विघ्न समाप्त नहीं हुआ—इसके लिये आप चिन्ता न करें। हमारी बात आप आदरपूर्वक स्वीकार कीजिये। देखिये, जो मनुष्य विधाताके बिगाड़े हुए कामको बनानेका विचार करता है, उसका मन अत्यन्त क्रोधमें भरकर भयंकर मोहमें फँस जाता है॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 499) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/19/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)