श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.34

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

मास्मिन्महाराज कृथाः स्म चिन्तां

निशामयास्मद्वच आदृतात्मा।

यद्ध्यायतो दैवहतं नु कर्तुं

मनोऽतिरुष्टं विशते तमोऽन्धम्॥ ३४

māsminmahārāja kṛthāḥ sma cintāṃ

niśāmayāsmadvaca ādṛtātmā|

yaddhyāyato daivahataṃ nu kartuṃ

mano'tiruṣṭaṃ viśate tamo'ndham|| 34

अर्थ

आपका यह यज्ञ निर्विघ्न समाप्त नहीं हुआ—इसके लिये आप चिन्ता न करें। हमारी बात आप आदरपूर्वक स्वीकार कीजिये। देखिये, जो मनुष्य विधाताके बिगाड़े हुए कामको बनानेका विचार करता है, उसका मन अत्यन्त क्रोधमें भरकर भयंकर मोहमें फँस जाता है॥ ३४॥✎ 404

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #404 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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