श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.14

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

प्रेतावासेषु घोरेषु प्रेतैर्भूतगणैर्वृतः।

अटत्युन्मत्तवन्‍नग्नो व्युप्तकेशो हसन् रुदन्॥ १४

pretāvāseṣu ghoreṣu pretairbhūtagaṇairvṛtaḥ|

aṭatyunmattavannagno vyuptakeśo hasan rudan|| 14

अर्थ

यह प्रेतोंके निवासस्थान भयंकर श्मशानोंमें भूत-प्रेतोंको साथ लिये घूमता रहता है। पूरे पागलकी तरह सिरके बाल बिखेरे नंग-धड़ंग भटकता है, कभी हँसता है, कभी रोता है॥ १४॥

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