यह प्रेतोंके निवासस्थान भयंकर श्मशानोंमें भूत-प्रेतोंको साथ लिये घूमता रहता है। पूरे पागलकी तरह सिरके बाल बिखेरे नंग-धड़ंग भटकता है, कभी हँसता है, कभी रोता है॥ १४॥
प्रेतावासेषु घोरेषु प्रेतैर्भूतगणैर्वृतः।
अटत्युन्मत्तवन्नग्नो व्युप्तकेशो हसन् रुदन्॥ १४
यह प्रेतोंके निवासस्थान भयंकर श्मशानोंमें भूत-प्रेतोंको साथ लिये घूमता रहता है। पूरे पागलकी तरह सिरके बाल बिखेरे नंग-धड़ंग भटकता है, कभी हँसता है, कभी रोता है॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.2.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 413) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/2/14/