श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.13

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

लुप्तक्रियायाशुचये मानिने भिन्‍नसेतवे।

अनिच्छन्‍नप्यदां बालां शूद्रायेवोशतीं गिरम्॥ १३

luptakriyāyāśucaye mānine bhinnasetave|

anicchannapyadāṃ bālāṃ śūdrāyevośatīṃ giram|| 13

अर्थ

हाय! जिस प्रकार शूद्रको कोई वेद पढ़ा दे, उसी प्रकार मैंने इच्छा न होते हुए भी भावीवश इसको अपनी सुकुमारी कन्या दे दी! इसने सत्कर्मका लोप कर दिया, यह सदा अपवित्र रहता है, बड़ा घमण्डी है और धर्मकी मर्यादाको तोड़ रहा है॥ १३॥

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