॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.2.12
गृहीत्वा मृगशावाक्ष्याः पाणिं मर्कटलोचनः।
प्रत्युत्थानाभिवादार्हे वाचाप्यकृत नोचितम्॥ १२
gṛhītvā mṛgaśāvākṣyāḥ pāṇiṃ markaṭalocanaḥ|
pratyutthānābhivādārhe vācāpyakṛta nocitam|| 12
अर्थ
बन्दरके-से नेत्रवाले इसने सत्पुरुषोंके समान मेरी सावित्री-सरीखी मृगनयनी पवित्र कन्याका अग्नि और ब्राह्मणोंके सामने पाणिग्रहण किया था, इसलिये यह एक प्रकार मेरे पुत्रके समान हो गया है। उचित तो यह था कि यह उठकर मेरा स्वागत करता, मुझे प्रणाम करता; परंतु इसने वाणीसे भी मेरा सत्कार नहीं किया॥ ११-१२॥