श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.11

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

एष मे शिष्यतां प्राप्तो यन्मे दुहितुरग्रहीत्।

पाणिं विप्राग्‍निमुखतः सावित्र्या इव साधुवत्॥ ११

eṣa me śiṣyatāṃ prāpto yanme duhituragrahīt|

pāṇiṃ viprāgnimukhataḥ sāvitryā iva sādhuvat|| 11

अर्थ

बन्दरके-से नेत्रवाले इसने सत्पुरुषोंके समान मेरी सावित्री-सरीखी मृगनयनी पवित्र कन्याका अग्‍नि और ब्राह्मणोंके सामने पाणिग्रहण किया था, इसलिये यह एक प्रकार मेरे पुत्रके समान हो गया है। उचित तो यह था कि यह उठकर मेरा स्वागत करता, मुझे प्रणाम करता; परंतु इसने वाणीसे भी मेरा सत्कार नहीं किया॥ ११-१२॥

यह अर्थ श्लोक 11–12 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें