श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.25

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

गिरः श्रुतायाः पुष्पिण्या मधुगन्धेन भूरिणा।

मथ्ना चोन्मथितात्मानः सम्मुह्यन्तु हरद्विषः॥ २५

giraḥ śrutāyāḥ puṣpiṇyā madhugandhena bhūriṇā|

mathnā conmathitātmānaḥ sammuhyantu haradviṣaḥ|| 25

अर्थ

वेदवाणीरूप लता फलश्रुतिरूप पुष्पोंसे सुशोभित है, उसके कर्मफलरूप मनमोहक गन्धसे इनके चित्त क्षुब्ध हो रहे हैं। इससे ये शंकरद्रोही कर्मोंके जालमें ही फँसे रहें॥ २५॥

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