श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.26

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

सर्वभक्षा द्विजा वृत्त्यै धृतविद्यातपोव्रताः।

वित्तदेहेन्द्रियारामा याचका विचरन्त्विह॥ २६

sarvabhakṣā dvijā vṛttyai dhṛtavidyātapovratāḥ|

vittadehendriyārāmā yācakā vicarantviha|| 26

अर्थ

ये ब्राह्मणलोग भक्ष्याभक्ष्यके विचारको छोड़कर केवल पेट पालनेके लिये ही विद्या, तप और व्रतादिका आश्रय लें तथा धन, शरीर और इन्द्रियोंके सुखको ही सुख मानकर—उन्हींके गुलाम बनकर दुनियामें भीख माँगते भटका करें’॥ २६॥

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