अरे! तुमलोग जो धर्ममर्यादाके संस्थापक एवं वर्णाश्रमियोंके रक्षक वेद और ब्राह्मणोंकी निन्दा करते हो, इससे मालूम होता है तुमने पाखण्डका आश्रय ले रखा है॥ ३०॥
ब्रह्म च ब्राह्मणांश्चैव यद्यूयं परिनिन्दथ।
सेतुं विधारणं पुंसामतः पाखण्डमाश्रिता॥ ३०
अरे! तुमलोग जो धर्ममर्यादाके संस्थापक एवं वर्णाश्रमियोंके रक्षक वेद और ब्राह्मणोंकी निन्दा करते हो, इससे मालूम होता है तुमने पाखण्डका आश्रय ले रखा है॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.2.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 414) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/2/30/