श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.29

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

नष्टशौचा मूढधियो जटाभस्मास्थिधारिणः।

विशन्तु शिवदीक्षायां यत्र दैवं सुरासवम्॥ २९

naṣṭaśaucā mūḍhadhiyo jaṭābhasmāsthidhāriṇaḥ|

viśantu śivadīkṣāyāṃ yatra daivaṃ surāsavam|| 29

अर्थ

जो लोग शौचाचारविहीन, मन्दबुद्धि तथा जटा, राख और हड्डियोंको धारण करनेवाले हैं—वे ही शैव-सम्प्रदायमें दीक्षित हों, जिसमें सुरा और आसव ही देवताओंके समान आदरणीय हैं॥ २९॥

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