tasyaivaṃ vadataḥ śāpaṃ bhṛgoḥ sa bhagavān bhavaḥ|
niścakrāma tataḥ kiṃcidvimanā iva sānugaḥ|| 33
अर्थ
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! भृगु ऋषिके इस प्रकार शाप देनेपर भगवान् शंकर कुछ खिन्न-से हो वहाँसे अपने अनुयायियोंसहित चल दिये॥ ३३॥
तस्यैवं वदतः शापं भृगोः स भगवान् भवः।
निश्चक्राम ततः किंचिद्विमना इव सानुगः॥ ३३
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! भृगु ऋषिके इस प्रकार शाप देनेपर भगवान् शंकर कुछ खिन्न-से हो वहाँसे अपने अनुयायियोंसहित चल दिये॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.2.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 415) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/2/33/