श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.6

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

उदतिष्ठन् सदस्यास्ते स्वधिष्ण्येभ्यः सहाग्नयः।

ऋते विरिञ्चं शर्वं च तद्भासाऽऽक्षिप्तचेतसः॥ ६

udatiṣṭhan sadasyāste svadhiṣṇyebhyaḥ sahāgnayaḥ|

ṛte viriñcaṃ śarvaṃ ca tadbhāsā''kṣiptacetasaḥ|| 6

अर्थ

उसी समय प्रजापति दक्षने भी उस सभामें प्रवेश किया। वे अपने तेजसे सूर्यके समान प्रकाशमान थे और उस विशाल सभा-भवनका अन्धकार दूर किये देते थे। उन्हें आया देख ब्रह्माजी और महादेवजीके अतिरिक्त अग्‍निपर्यन्त सभी सभासद् उनके तेजसे प्रभावित होकर अपने-अपने आसनोंसे उठकर खड़े हो गये॥ ५-६॥

यह अर्थ श्लोक 5–6 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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