परन्तु महादेवजीको पहलेसे ही बैठा देख तथा उनसे अभ्युत्थानादिके रूपमें कुछ भी आदर न पाकर दक्ष उनका यह व्यवहार सहन न कर सके। उन्होंने उनकी ओर टेढ़ी नजरसे इस प्रकार देखा मानो उन्हें वे क्रोधाग्निसे जला डालेंगे। फिर कहने लगे—॥ ८॥
प्राङ्निषण्णं मृडं दृष्ट्वा नामृष्यत्तदनादृतः।
उवाच वामं चक्षुर्भ्यामभिवीक्ष्य दहन्निव॥ ८
परन्तु महादेवजीको पहलेसे ही बैठा देख तथा उनसे अभ्युत्थानादिके रूपमें कुछ भी आदर न पाकर दक्ष उनका यह व्यवहार सहन न कर सके। उन्होंने उनकी ओर टेढ़ी नजरसे इस प्रकार देखा मानो उन्हें वे क्रोधाग्निसे जला डालेंगे। फिर कहने लगे—॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.2.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 412) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/2/8/