श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.20.14

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

श्रेयः प्रजापालनमेव राज्ञो

यत्साम्पराये सुकृतात् षष्ठमंशम्।

हर्तान्यथा हृतपुण्यः प्रजाना-

मरक्षिता करहारोऽघमत्ति॥ १४

śreyaḥ prajāpālanameva rājño

yatsāmparāye sukṛtāt ṣaṣṭhamaṃśam|

hartānyathā hṛtapuṇyaḥ prajānā-

marakṣitā karahāro'ghamatti|| 14

अर्थ

राजाका कल्याण प्रजापालनमें ही है। इससे उसे परलोकमें प्रजाके पुण्यका छठा भाग मिलता है। इसके विपरीत जो राजा प्रजाकी रक्षा तो नहीं करता; किंतु उससे कर वसूल करता जाता है, उसका सारा पुण्य तो प्रजा छीन लेती है और बदलेमें उसे प्रजाके पापका भागी होना पड़ता है॥ १४॥

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