श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.20.15

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

एवं द्विजाग्र्यानुमतानुवृत्त-

धर्मप्रधानोऽन्यतमोऽवितास्याः ।

ह्रस्वेन कालेन गृहोपयातान्

द्रष्टासि सिद्धाननुरक्तलोकः॥ १५

evaṃ dvijāgryānumatānuvṛtta-

dharmapradhāno'nyatamo'vitāsyāḥ |

hrasvena kālena gṛhopayātān

draṣṭāsi siddhānanuraktalokaḥ|| 15

अर्थ

ऐसा विचारकर यदि तुम श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी सम्मति और पूर्व परम्परासे प्राप्त हुए धर्मको ही मुख्यतः अपना लो और कहीं भी आसक्त न होकर इस पृथ्वीका न्यायपूर्वक पालन करते रहो तो सब लोग तुमसे प्रेम करेंगे और कुछ ही दिनोंमें तुम्हें घर बैठे ही सनकादि सिद्धोंके दर्शन होंगे॥ १५॥

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