महाराज पृथु बोले—मोक्षपति प्रभो! आप वर देनेवाले ब्रह्मादि देवताओंको भी वर देनेमें समर्थ हैं। कोई भी बुद्धिमान् पुरुष आपसे देहाभिमानियोंके भोगने योग्य विषयोंको कैसे माँग सकता है? वे तो नारकी जीवोंको भी मिलते ही हैं। अतः मैं इन तुच्छ विषयोंको आपसे नहीं माँगता॥ २३॥✎ 1330
वरान् विभो त्वद्वरदेश्वराद् बुधः
कथं वृणीते गुणविक्रियात्मनाम्।
ये नारकाणामपि सन्ति देहिनां
तानीश कैवल्यपते वृणे न च॥ २३
महाराज पृथु बोले—मोक्षपति प्रभो! आप वर देनेवाले ब्रह्मादि देवताओंको भी वर देनेमें समर्थ हैं। कोई भी बुद्धिमान् पुरुष आपसे देहाभिमानियोंके भोगने योग्य विषयोंको कैसे माँग सकता है? वे तो नारकी जीवोंको भी मिलते ही हैं। अतः मैं इन तुच्छ विषयोंको आपसे नहीं माँगता॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.20.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 503) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/20/23/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1330 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): चरण-कमलोंका → चरणकमलोंका