श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.20.23

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

पृथुरुवाच

वरान् विभो त्वद्वरदेश्‍वराद् बुधः

कथं वृणीते गुणविक्रियात्मनाम्।

ये नारकाणामपि सन्ति देहिनां

तानीश कैवल्यपते वृणे न च॥ २३

varān vibho tvadvaradeśvarād budhaḥ

kathaṃ vṛṇīte guṇavikriyātmanām|

ye nārakāṇāmapi santi dehināṃ

tānīśa kaivalyapate vṛṇe na ca|| 23

अर्थ

महाराज पृथु बोले—मोक्षपति प्रभो! आप वर देनेवाले ब्रह्मादि देवताओंको भी वर देनेमें समर्थ हैं। कोई भी बुद्धिमान् पुरुष आपसे देहाभिमानियोंके भोगने योग्य विषयोंको कैसे माँग सकता है? वे तो नारकी जीवोंको भी मिलते ही हैं। अतः मैं इन तुच्छ विषयोंको आपसे नहीं माँगता॥ २३॥✎ 1330

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1330 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): चरण-कमलोंका → चरणकमलोंका

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