मुझे तो उस मोक्षपदकी भी इच्छा नहीं है जिसमें महापुरुषोंके हृदयसे उनके मुखद्वारा निकला हुआ आपके चरणकमलोंका मकरन्द नहीं है—जहाँ आपकी कीर्ति-कथा सुननेका सुख नहीं मिलता। इसलिये मेरी तो यही प्रार्थना है कि आप मुझे दस हजार कान दे दीजिये, जिनसे मैं आपके लीलागुणोंको सुनता ही रहूँ॥ २४॥✎ 1330
न कामये नाथ तदप्यहं क्वचिन्-
न यत्र युष्मच्चरणाम्बुजासवः।
महत्तमान्तर्हृदयान्मुखच्युतो
विधत्स्व कर्णायुतमेष मे वरः॥ २४
मुझे तो उस मोक्षपदकी भी इच्छा नहीं है जिसमें महापुरुषोंके हृदयसे उनके मुखद्वारा निकला हुआ आपके चरणकमलोंका मकरन्द नहीं है—जहाँ आपकी कीर्ति-कथा सुननेका सुख नहीं मिलता। इसलिये मेरी तो यही प्रार्थना है कि आप मुझे दस हजार कान दे दीजिये, जिनसे मैं आपके लीलागुणोंको सुनता ही रहूँ॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.20.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 503) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/20/24/
टिप्पणियाँ
२
प्रा० पा०—च्युतं विध०।
(मुद्रित पृष्ठ 503)
३
प्रा० पा०—कर्णामृत०।
(मुद्रित पृष्ठ 503)
४
प्रा० पा०—वचः।
(मुद्रित पृष्ठ 503)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1330 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): चरण-कमलोंका → चरणकमलोंका