श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.20.24

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

न कामये नाथ तदप्यहं क्‍वचिन्-

न यत्र युष्मच्चरणाम्बुजासवः।

महत्तमान्तर्हृदयान्मुखच्युतो२

विधत्स्व कर्णायुतमेष३ मे वरः४॥ २४

na kāmaye nātha tadapyahaṃ kvacin-

na yatra yuṣmaccaraṇāmbujāsavaḥ|

mahattamāntarhṛdayānmukhacyuto

vidhatsva karṇāyutameṣa me varaḥ|| 24

अर्थ

मुझे तो उस मोक्षपदकी भी इच्छा नहीं है जिसमें महापुरुषोंके हृदयसे उनके मुखद्वारा निकला हुआ आपके चरणकमलोंका मकरन्द नहीं है—जहाँ आपकी कीर्ति-कथा सुननेका सुख नहीं मिलता। इसलिये मेरी तो यही प्रार्थना है कि आप मुझे दस हजार कान दे दीजिये, जिनसे मैं आपके लीलागुणोंको सुनता ही रहूँ॥ २४॥✎ 1330

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—च्युतं विध०।

    (मुद्रित पृष्ठ 503)
  2. ३

    प्रा० पा०—कर्णामृत०।

    (मुद्रित पृष्ठ 503)
  3. ४

    प्रा० पा०—वचः।

    (मुद्रित पृष्ठ 503)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1330 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): चरण-कमलोंका → चरणकमलोंका

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें