पुण्यकीर्ति प्रभो! आपके चरणकमल-मकरन्दरूपी अमृत-कणोंको लेकर महापुरुषोंके मुखसे जो वायु निकलती है, उसीमें इतनी शक्ति होती है कि वह तत्त्वको भूले हुए हम कुयोगियोंको पुनः तत्त्वज्ञान करा देती है। अतएव हमें दूसरे वरोंकी कोई आवश्यकता नहीं है॥ २५॥✎ 1330
स उत्तमश्लोक महन्मुखच्युतो
भवत्पदाम्भोजसुधाकणानिलः ।
स्मृतिं पुनर्विस्मृततत्त्ववर्त्मनां
कुयोगिनां नो वितरत्यलं वरैः॥ २५
पुण्यकीर्ति प्रभो! आपके चरणकमल-मकरन्दरूपी अमृत-कणोंको लेकर महापुरुषोंके मुखसे जो वायु निकलती है, उसीमें इतनी शक्ति होती है कि वह तत्त्वको भूले हुए हम कुयोगियोंको पुनः तत्त्वज्ञान करा देती है। अतएव हमें दूसरे वरोंकी कोई आवश्यकता नहीं है॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.20.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 503) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/20/25/
टिप्पणियाँ
५
प्रा० पा०—मुखाच्च्युतो।
(मुद्रित पृष्ठ 503)
६
प्रा० पा०—कर्मणां।
(मुद्रित पृष्ठ 503)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1330 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): चरण-कमलोंका → चरणकमलोंका