श्रीमैत्रेयजीने कहा—साधुश्रेष्ठ विदुरजी! महाराज पृथु गंगा और यमुनाके मध्यवर्ती देशमें निवास कर अपने पुण्यकर्मोंके क्षयकी इच्छासे प्रारब्धवश प्राप्त हुए भोगोंको ही भोगते थे॥ ११॥✎ 1332
गंगायमुनयोर्नद्योरन्तराक्षेत्रमावसन् ।
आरब्धानेव बुभुजे भोगान् पुण्यजिहासया॥ ११
श्रीमैत्रेयजीने कहा—साधुश्रेष्ठ विदुरजी! महाराज पृथु गंगा और यमुनाके मध्यवर्ती देशमें निवास कर अपने पुण्यकर्मोंके क्षयकी इच्छासे प्रारब्धवश प्राप्त हुए भोगोंको ही भोगते थे॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.21.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 507) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/21/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1332 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नक्षत्र-मण्डलमें → नक्षत्रमण्डलमें