उनके उस पराक्रमके उच्छिष्टरूप विषयभोगोंसे ही आज भी सम्पूर्ण राजा तथा लोकपालोंके सहित समस्त लोक इच्छानुसार जीवन-निर्वाह करते हैं। भला, ऐसा कौन समझदार होगा जो उनकी पवित्र कीर्ति सुनना न चाहेगा। अतः अभी आप मुझे उनके कुछ और भी पवित्र चरित्र सुनाइये॥ १०॥
को न्वस्य कीर्तिं न शृणोत्यभिज्ञो
यद्विक्रमोच्छिष्टमशेषभूपाः ।
लोकाः सपाला उपजीवन्ति काम-
मद्यापि तन्मे वद कर्म शुद्धम्॥ १०
उनके उस पराक्रमके उच्छिष्टरूप विषयभोगोंसे ही आज भी सम्पूर्ण राजा तथा लोकपालोंके सहित समस्त लोक इच्छानुसार जीवन-निर्वाह करते हैं। भला, ऐसा कौन समझदार होगा जो उनकी पवित्र कीर्ति सुनना न चाहेगा। अतः अभी आप मुझे उनके कुछ और भी पवित्र चरित्र सुनाइये॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.21.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 506) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/10/
टिप्पणियाँ
२
प्रा० पा०—उपयन्ति।
(मुद्रित पृष्ठ 506)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1030 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): उपजीवन्ति२ → उपजीवन्ति