श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.13

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

एकदाऽऽसीन्महासत्रदीक्षा तत्र दिवौकसाम्।

समाजो ब्रह्मर्षीणां च राजर्षीणां च सत्तम॥ १३

ekadā''sīnmahāsatradīkṣā tatra divaukasām|

samājo brahmarṣīṇāṃ ca rājarṣīṇāṃ ca sattama|| 13

अर्थ

एक बार उन्होंने एक महासत्रकी दीक्षा ली; उस समय वहाँ देवताओं, ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंका बहुत बड़ा समाज एकत्र हुआ॥ १३॥✎ 1332

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1332 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नक्षत्र-मण्डलमें → नक्षत्रमण्डलमें

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