श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.14

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

तस्मिन्‍नर्हत्सु सर्वेषु स्वर्चितेषु यथार्हतः।

उत्थितः सदसो मध्ये ताराणामुडुराडिव॥ १४

tasminnarhatsu sarveṣu svarciteṣu yathārhataḥ|

utthitaḥ sadaso madhye tārāṇāmuḍurāḍiva|| 14

अर्थ

उस समाजमें महाराज पृथुने उन पूजनीय अतिथियोंका यथायोग्य सत्कार किया और फिर उस सभामें, नक्षत्रमण्डलमें चन्द्रमाके समान खड़े हो गये॥ १४॥✎ 1332

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1332 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नक्षत्र-मण्डलमें → नक्षत्रमण्डलमें

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