श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

व्यञ्जिताशेषगात्रश्रीर्नियमे न्यस्तभूषणः।

कृष्णाजिनधरः श्रीमान् कुशपाणिः कृतोचितः॥ १८

vyañjitāśeṣagātraśrīrniyame nyastabhūṣaṇaḥ|

kṛṣṇājinadharaḥ śrīmān kuśapāṇiḥ kṛtocitaḥ|| 18

अर्थ

दीक्षाके नियमानुसार उन्होंने समस्त आभूषण उतार दिये थे; इसीसे उनके शरीरके अंग-प्रत्यंगकी शोभा अपने स्वाभाविक रूपमें स्पष्ट झलक रही थी। वे शरीरपर कृष्णमृगका चर्म और हाथोंमें कुशा धारण किये हुए थे। इससे उनके शरीरकी कान्ति और भी बढ़ गयी थी। वे अपने सारे नित्यकृत्य यथाविधि सम्पन्‍न कर चुके थे॥ १८॥✎ 1332

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1332 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नक्षत्र-मण्डलमें → नक्षत्रमण्डलमें

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