राजा पृथुने मानो सारी सभाको हर्षसे सराबोर करते हुए अपने शीतल एवं स्नेहपूर्ण नेत्रोंसे चारों ओर देखा और फिर अपना भाषण प्रारम्भ किया॥ १९॥✎ 1332
शिशिरस्निग्धताराक्षः समैक्षत समन्ततः।
ऊचिवानिदमुर्वीशः सदः संहर्षयन्निव॥ १९
राजा पृथुने मानो सारी सभाको हर्षसे सराबोर करते हुए अपने शीतल एवं स्नेहपूर्ण नेत्रोंसे चारों ओर देखा और फिर अपना भाषण प्रारम्भ किया॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.21.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 507) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1332 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नक्षत्र-मण्डलमें → नक्षत्रमण्डलमें