अतः प्रिय प्रजाजन! अपने इस राजाका परलोकमें हित करनेके लिये आपलोग परस्पर दोषदृष्टि छोड़कर हृदयसे भगवान्को याद रखते हुए अपने-अपने कर्तव्यका पालन करते रहिये; क्योंकि आपका स्वार्थ भी इसीमें है और इस प्रकार मुझपर भी आपका बड़ा अनुग्रह होगा॥ २५॥✎ 408
तत् प्रजा भर्तृपिण्डार्थं स्वार्थमेवानसूयवः।
कुरुताधोक्षजधियस्तर्हि मेऽनुग्रहः कृतः॥ २५
अतः प्रिय प्रजाजन! अपने इस राजाका परलोकमें हित करनेके लिये आपलोग परस्पर दोषदृष्टि छोड़कर हृदयसे भगवान्को याद रखते हुए अपने-अपने कर्तव्यका पालन करते रहिये; क्योंकि आपका स्वार्थ भी इसीमें है और इस प्रकार मुझपर भी आपका बड़ा अनुग्रह होगा॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.21.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 508) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/21/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)