वीरवर पृथुजी! आप तो पृथ्वीके पिता ही हैं और सब लोकोंके एकमात्र स्वामी श्रीहरिमें भी आपकी ऐसी अविचल भक्ति है, इसलिये आप अनन्त वर्षोंतक जीवित रहें॥ ४८॥✎ 409
वीरवर्य पितः पृथ्व्याः समाः संजीव शाश्वतीः।
यस्येदृश्यच्युते भक्तिः सर्वलोकैकभर्तरि॥ ४८
वीरवर पृथुजी! आप तो पृथ्वीके पिता ही हैं और सब लोकोंके एकमात्र स्वामी श्रीहरिमें भी आपकी ऐसी अविचल भक्ति है, इसलिये आप अनन्त वर्षोंतक जीवित रहें॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.21.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 511) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/21/48/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)