इसी प्रकार हिरण्यकशिपु भी भगवान्की निन्दा करनेके कारण नरकोंमें गिरनेवाला ही था कि अपने पुत्र प्रह्लादके प्रभावसे उन्हें पार कर गया॥ ४७॥✎ 409
हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः।
विविक्षुरत्यगात्सूनोः प्रह्रादस्यानुभावतः॥ ४७
इसी प्रकार हिरण्यकशिपु भी भगवान्की निन्दा करनेके कारण नरकोंमें गिरनेवाला ही था कि अपने पुत्र प्रह्लादके प्रभावसे उन्हें पार कर गया॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.21.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 511) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/21/47/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)