श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.16

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

व्यक्तमात्मवतामात्मा भगवानात्मभावनः।

स्वानामनुग्रहायेमां सिद्धरूपी चरत्यजः॥ १६

vyaktamātmavatāmātmā bhagavānātmabhāvanaḥ|

svānāmanugrahāyemāṃ siddharūpī caratyajaḥ|| 16

अर्थ

यह निश्‍चय है कि जो आत्मवान् (धीर) पुरुषोंमें ‘आत्मा’ रूपसे प्रकाशित होते हैं और उपासकोंके हृदयमें अपने स्वरूपको प्रकट करनेवाले हैं, वे अजन्मा भगवान् नारायण ही अपने भक्तोंपर कृपा करनेके लिये आप-जैसे सिद्ध पुरुषोंके रूपमें इस पृथ्वीपर विचरा करते हैं॥ १६॥

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