श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—राजा पृथुके ये युक्तियुक्त, गम्भीर, परिमित और मधुर वचन सुनकर श्रीसनत्कुमारजी बड़े प्रसन्न हुए और कुछ मुसकराते हुए कहने लगे॥ १७॥
पृथोस्तत्सूक्तमाकर्ण्य सारं सुष्ठु मितं मधु।
स्मयमान इव प्रीत्या कुमारः प्रत्युवाच ह॥ १७
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—राजा पृथुके ये युक्तियुक्त, गम्भीर, परिमित और मधुर वचन सुनकर श्रीसनत्कुमारजी बड़े प्रसन्न हुए और कुछ मुसकराते हुए कहने लगे॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 513) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/22/17/