श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

सनत्कुमार उवाच

साधु पृष्टं महाराज सर्वभूतहितात्मना।

भवता विदुषा चापि साधूनां मतिरीदृशी॥ १८

sādhu pṛṣṭaṃ mahārāja sarvabhūtahitātmanā|

bhavatā viduṣā cāpi sādhūnāṃ matirīdṛśī|| 18

अर्थ

श्रीसनत्कुमारजीने कहा—महाराज! आपने सब कुछ जानते हुए भी समस्त प्राणियोंके कल्याणकी दृष्टिसे बड़ी अच्छी बात पूछी है। सच है, साधुपुरुषोंकी बुद्धि ऐसी ही हुआ करती है॥ १८॥

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