श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.20

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

अस्त्येव राजन् भवतो मधुद्विषः

पादारविन्दस्य गुणानुवादने।

रतिर्दुरापा विधुनोति नैष्ठिकी

कामं कषायं मलमन्तरात्मनः॥ २०

astyeva rājan bhavato madhudviṣaḥ

pādāravindasya guṇānuvādane|

ratirdurāpā vidhunoti naiṣṭhikī

kāmaṃ kaṣāyaṃ malamantarātmanaḥ|| 20

अर्थ

राजन्! श्रीमधुसूदन भगवान्‌के चरणकमलोंके गुणानुवादमें अवश्य ही आपकी अविचल प्रीति है। हर किसीको इसका प्राप्त होना बहुत कठिन है और प्राप्त हो जानेपर यह हृदयके भीतर रहनेवाले उस वासनारूप मलको सर्वथा नष्ट कर देती है, जो और किसी उपायसे जल्दी नहीं छूटता॥ २०॥✎ 410

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #410 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् की → श्रीभगवान्‌की

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