शास्त्र जीवोंके कल्याणके लिये भलीभाँति विचार करनेवाले हैं; उनमें आत्मासे भिन्न देहादिके प्रति वैराग्य तथा अपने आत्मस्वरूप निर्गुण ब्रह्ममें सुदृढ़ अनुराग होना—यही कल्याणका साधन निश्चित किया गया है॥ २१॥✎ 410
शास्त्रेष्वियानेव सुनिश्चितो नृणां
क्षेमस्य सध्र्यग्विमृशेषु हेतुः।
असंग आत्मव्यतिरिक्त आत्मनि
दृढा रतिर्ब्रह्मणि निर्गुणे च या॥ २१
शास्त्र जीवोंके कल्याणके लिये भलीभाँति विचार करनेवाले हैं; उनमें आत्मासे भिन्न देहादिके प्रति वैराग्य तथा अपने आत्मस्वरूप निर्गुण ब्रह्ममें सुदृढ़ अनुराग होना—यही कल्याणका साधन निश्चित किया गया है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 514) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/22/21/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—मति।
(मुद्रित पृष्ठ 514)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#410 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् की → श्रीभगवान्की