जबतक अन्तःकरणरूप उपाधि रहती है, तभीतक पुरुषको जीवात्मा, इन्द्रियोंके विषय और इन दोनोंका सम्बन्ध करानेवाले अहंकारका अनुभव होता है; इसके बाद नहीं॥ २८॥
आत्मानमिन्द्रियार्थं च परं यदुभयोरपि।
सत्याशय उपाधौ वै पुमान् पश्यति नान्यदा॥ २८
जबतक अन्तःकरणरूप उपाधि रहती है, तभीतक पुरुषको जीवात्मा, इन्द्रियोंके विषय और इन दोनोंका सम्बन्ध करानेवाले अहंकारका अनुभव होता है; इसके बाद नहीं॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 515) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/22/28/