श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.30

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैराक्षिप्तं ध्यायतां मनः।

चेतनां हरते बुद्धेः स्तम्बस्तोयमिव ह्रदात्॥ ३०

indriyairviṣayākṛṣṭairākṣiptaṃ dhyāyatāṃ manaḥ|

cetanāṃ harate buddheḥ stambastoyamiva hradāt|| 30

अर्थ

जो लोग विषयचिन्तनमें लगे रहते हैं, उनकी इन्द्रियाँ विषयोंमें फँस जाती हैं तथा मनको भी उन्हींकी ओर खींच ले जाती हैं। फिर तो जैसे जलाशयके तीरपर उगे हुए कुशादि अपनी जड़ोंसे उसका जल खींचते रहते हैं, उसी प्रकार वह इन्द्रियासक्त मन बुद्धिकी विचारशक्तिको क्रमशः हर लेता है॥ ३०॥

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