श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.41

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

स एवं ब्रह्मपुत्रेण कुमारेणात्ममेधसा।

दर्शितात्मगतिः सम्यक्प्रशस्योवाच तं नृपः॥ ४१

sa evaṃ brahmaputreṇa kumāreṇātmamedhasā|

darśitātmagatiḥ samyakpraśasyovāca taṃ nṛpaḥ|| 41

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! ब्रह्माजीके पुत्र आत्मज्ञानी सनत्कुमारजीसे इस प्रकार आत्मतत्त्वका उपदेश पाकर महाराज पृथुने उनकी बहुत प्रशंसा करते हुए कहा॥ ४१॥

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