श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.51

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

फलं ब्रह्मणि विन्यस्य निर्विषङ्गः समाहितः।

कर्माध्यक्षं च मन्वान आत्मानं प्रकृतेः परम्॥ ५१

phalaṃ brahmaṇi vinyasya nirviṣaṅgaḥ samāhitaḥ|

karmādhyakṣaṃ ca manvāna ātmānaṃ prakṛteḥ param|| 51

अर्थ

इस प्रकार एकाग्र चित्तसे समस्त कर्मोंका फल परमात्माको अर्पण करके आत्माको कर्मोंका साक्षी एवं प्रकृतिसे अतीत देखनेके कारण वे सर्वथा निर्लिप्त रहे॥ ५१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें