श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.52

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

गृहेषु वर्तमानोऽपि स साम्राज्यश्रियान्वितः।

नासज्जतेन्द्रियार्थेषु निरहंमतिरर्कवत्॥ ५२

gṛheṣu vartamāno'pi sa sāmrājyaśriyānvitaḥ|

nāsajjatendriyārtheṣu nirahaṃmatirarkavat|| 52

अर्थ

जिस प्रकार सूर्यदेव सर्वत्र प्रकाश करनेपर भी वस्तुओंके गुण-दोषसे निर्लेप रहते हैं, उसी प्रकार सार्वभौम साम्राज्यलक्ष्मीसे सम्पन्‍न और गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी अहंकारशून्य होनेके कारण वे इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्त नहीं हुए॥ ५२॥

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