जिस प्रकार सूर्यदेव सर्वत्र प्रकाश करनेपर भी वस्तुओंके गुण-दोषसे निर्लेप रहते हैं, उसी प्रकार सार्वभौम साम्राज्यलक्ष्मीसे सम्पन्न और गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी अहंकारशून्य होनेके कारण वे इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्त नहीं हुए॥ ५२॥
गृहेषु वर्तमानोऽपि स साम्राज्यश्रियान्वितः।
नासज्जतेन्द्रियार्थेषु निरहंमतिरर्कवत्॥ ५२
जिस प्रकार सूर्यदेव सर्वत्र प्रकाश करनेपर भी वस्तुओंके गुण-दोषसे निर्लेप रहते हैं, उसी प्रकार सार्वभौम साम्राज्यलक्ष्मीसे सम्पन्न और गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी अहंकारशून्य होनेके कारण वे इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्त नहीं हुए॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 518) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/22/52/